सफर

ये कारवां ये उठता गुबार,
अनंत तक जाती राहे
बदलती मंजिलें बार बार |
आगाज़ में कुछ लोग चले थे,
कुछ हमें तो कुछ दुनिया छोड़ गए |
राहों में कुछ नए जुड़े ,
और राहों में ही मुड़ गए |

कभी हौसले पस्त हुए
कभी खुद को फतह किआ,
कभी गैर हमराज़ हो गए
तो कभी खुद को ही खो दिया |
रश्मि का वो सुबह को आना,
शाम को अँधेरे का उपहास,
किसी अनदेखे हमराही का वो हर पल होना अहसास,
वो चाँद तारो का इनपर यु करना अट्टहास|
पगडंडिया तब्दील हुई सड़को में,
बल्ब बानी ढिबरी की चाहे,
पर हमारी तिकड़ी कभी न बदली,
मै मेरे गीत और मेरी राहे |
जीवन मेरा कुछ ऐसा ही
खूबसूरत सफर रहा है ।
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उद्देश्य मिश्रा

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