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यायावर

यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। जेष्ठ दोपहरी  भीग गए तो , सावन  में फिर जलना होगा। प्रकृति है जो रहे संतुलित, संतुलन में पलना होगा । पंख लगे तो उड़ जाता मैं, चक्र लगे तो दौड़ता रहता। प्रबल पाव तो कदम चलेंगे, या रेंग रेंग कर चलना होगा। यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। जड़ होना जो नियति होती, जड़ का जीवन मैं पाता। पुलकित होता अचल ही रहता, अचल भाव में झर जाता। भांति भांति की ऋतू जो आती, रंग देख कर इठलाता। जो ऋतू ना बदली सही समय पर, आश्रित होता, बस बिलखाता। चल जीवन है, चपल हो शैली, आरोहण हो या ढलना होगा। यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। --------------------------------- उद्देश्य मिश्र नियति- destiny, चल- moving, चपल- Agile, आरोहण- ascend

मन क्या ढूढ़ता है

कोई एक तलाश है, जो अब तक चल रही है, इसकी पुरानी प्यास है, जो अब तक जल रही है, डगर डगर घूमता, ये आसमाँ की छाँव में, मेरे अल्हड मन की जिद्द, अब तक अटल रही है। कम्बख्त क्षितिज पर कही सराय ढूढ़ता है, ज़िन्दगी को जीने का उपाय ढूंढता है। खुमार आवारगी का कुछ ऐसा चढ़ा इसपर, की हैसियत के पार की तम्मनाएँ ढूढ़ता है । ढूंढता है रोड़े, राहों में बिछाने को, मंजिल को खोने को, और खुद को मिटाने को, बांध कर पट्टी काली ,आँखों पर अपनी, जाना है जिधर वो दिशायें ढूढ़ता है। सुनता पत्तिओं को छेड़ती हवाओं को, सूंघता फैली मदमस्त फ़िज़ाओ को, लहराती नदियों में बाधाएं ढूढ़ता है बेशरम जाने क्या क्या बलायें ढूढ़ता है। किनारे पर बैठना इसे अच्छा नहीं लगता, भंवर में उतर कर लहर ढूढ़ता है, बन न पायेगा नीलकंठ, ये जानता है तभी भी जाने क्यों वो जहर ढूंढता है । निहारा है आसमां को, पूरी रात कल इसने, और आज दिन में वो एक तारा ढूढ़ता है, कुछ पल का खूबसूरत सफर था साथ उसके, फिर से उस सफर का सहारा ढूढ़ता है। खयालो में खोया रहता है  कहीं पर, लम्हे कुछ जीवन के छोड़ता वहीं पर, जगता है जब भी, जागती नींद से ये अपनी...

स्वयं

हुल्लड़ में, कटी पतंग सा हूँ, सतत धारा में, टूटी तरंग सा हूँ। अधूरा मैं, हैं अधूरी रचनाएं मेरी, संकलन में विचारो के, थोड़ा तंग सा हूँ। ----------------------------------------------- उद्देश्य मिश्रा

सृष्टि सिद्धान्त

सूर्योदय तो सूर्यास्त निश्चित, अगर पूर्व बना, पाश्चात्य निश्चित। साक्ष्य है इतिहास वर्तमान का, लुप्त होना विद्यमान का। परिवर्तित विज्ञान निश्चित, परिवर्तित संज्ञान निश्चित निश्चति बदलना ईमान का विधि और विधान का। परिवर्तित इतिहास निश्चित, परिवर्तित विश्वास निश्चित। निश्चित बदलना भूगोल का, ऐतिहासिक खगोल का। विष्मरण सम्मान निश्चित, विष्मरण अपमान निश्चित। निश्चित भूलना विचार का नीतिसंगत अचार का। -------------------------------- उद्देश्य मिश्रा संज्ञान- awareness ,ईमान- religion , विद्यमान- existing विधि- fate, विश्वास- mythology, नीतिसंगत- moral

तुम सर्जक बनो

तुम सर्जक बनो, लगो स्वप्न सृजन में। वो चरित्रहीन हैं,जो स्वप्न मारते। हर सहर सम्पूर्ण होते, मुस्कुराते, काम पर चले जाते, परंतु शाम की मद्धम रोशनी में, खंडित हो घर आते। आराम फ...

आदिकाल से अंत शुरू है।

किलकारी सा शंखनाद दे, जीवन का संग्राम शुरू है। उस छण से ही ढाल शुरू है, जिस छण से सोपान शुरू है। अन्त शुरू हर अभिमानी का, जब से वितरण ज्ञान शुरू है। शुरू है अंत हर ज्ञानी का, जिस ...

प्रेम के कुछ गीत

मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ । घर के शीश पर जा कर के कुछ बैठ जाते, धूप और बारिश से क्रीड़ा हैं रचाते । कुछ की किस्मत फर्श में है लिखी जाती, नित्य पोछि उनकी जाती है वो छाती । कुछ पा कर है रूप मूर्ति, आराध्य बनते , साधु संत और सूफियो का साध्य बनते। पर हर कदम की ठोकरे लगती है जिसको उस पाषाण के टिका लगाना चाहता हूँ, मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ | बाग की तरुणाई में कुछ झुमती है, भृंग के अधरों को यू ही चूमती है, कुछ का जीवन है न्योछावर श्रृंगार में तो कुछ का जीवन इत्र और गुलाल में तो कुछ का जीवन यू ही डंठल पर है सुखा या न्योछावर जानवर पर जो है भूखा। कुछ है कलिया वायु की धारा में उड़ गई, उनसे ही संगीत उठाना चाहता हूँ मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ। _______________________________ उद्देश्य मिश्रा