पुराना मकान
मै एक आलीशान घर था, आंगन में जिसके तुलसी लगी थी। बगल की गली में बस मिट्टी थी , सामने फूलो की डालियाँ लहराती । बाहर बरामदे में एक कुर्सी थी , दो तखत उसके साथ होते । तखत के निचे एक कुत्ता सोता था , बाहर कनेर के पेड़ पर कुछ कौवे बसते। सुबह शाम उस तखत पर कुछ बच्चे दीखते, किताबे खोले , डांट सुनते हुए , दोपहर को कोई वहा सोता था । गौरये की ची ची , जो सुबह को शुरू होती पुरे दिन परेशां करती थी । दिवारो में दराज ढूढ़ कर घर बनाया था उन्होंने । वक़्त के साथ मेरी गोद के बचे बड़े हो गए , सड़के पक्की हो गयी है , ...