मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ । घर के शीश पर जा कर के कुछ बैठ जाते, धूप और बारिश से क्रीड़ा हैं रचाते । कुछ की किस्मत फर्श में है लिखी जाती, नित्य पोछि उनकी जाती है वो छाती । कुछ पा कर है रूप मूर्ति, आराध्य बनते , साधु संत और सूफियो का साध्य बनते। पर हर कदम की ठोकरे लगती है जिसको उस पाषाण के टिका लगाना चाहता हूँ, मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ | बाग की तरुणाई में कुछ झुमती है, भृंग के अधरों को यू ही चूमती है, कुछ का जीवन है न्योछावर श्रृंगार में तो कुछ का जीवन इत्र और गुलाल में तो कुछ का जीवन यू ही डंठल पर है सुखा या न्योछावर जानवर पर जो है भूखा। कुछ है कलिया वायु की धारा में उड़ गई, उनसे ही संगीत उठाना चाहता हूँ मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ। _______________________________ उद्देश्य मिश्रा