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Showing posts from March, 2019

आदिकाल से अंत शुरू है।

किलकारी सा शंखनाद दे, जीवन का संग्राम शुरू है। उस छण से ही ढाल शुरू है, जिस छण से सोपान शुरू है। अन्त शुरू हर अभिमानी का, जब से वितरण ज्ञान शुरू है। शुरू है अंत हर ज्ञानी का, जिस ...

प्रेम के कुछ गीत

मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ । घर के शीश पर जा कर के कुछ बैठ जाते, धूप और बारिश से क्रीड़ा हैं रचाते । कुछ की किस्मत फर्श में है लिखी जाती, नित्य पोछि उनकी जाती है वो छाती । कुछ पा कर है रूप मूर्ति, आराध्य बनते , साधु संत और सूफियो का साध्य बनते। पर हर कदम की ठोकरे लगती है जिसको उस पाषाण के टिका लगाना चाहता हूँ, मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ | बाग की तरुणाई में कुछ झुमती है, भृंग के अधरों को यू ही चूमती है, कुछ का जीवन है न्योछावर श्रृंगार में तो कुछ का जीवन इत्र और गुलाल में तो कुछ का जीवन यू ही डंठल पर है सुखा या न्योछावर जानवर पर जो है भूखा। कुछ है कलिया वायु की धारा में उड़ गई, उनसे ही संगीत उठाना चाहता हूँ मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ। _______________________________ उद्देश्य मिश्रा

राजनीति हिंदुस्तान की

शाशक और शासित का संबंध कुछ ऐसा है, दशा बदलती नही, बल का पुनर्वितरण होता है। उद्यान जब भी भरता है, नन्ही कलियो के रंगों से, रक्षा के नाम, वहीं भौरों का विचरण होता है। कोई कहता है ,क...

राही

हां है वो भ्रमित वो राही है, राहों का चयनित वो राही है। दर्शन का अभिलाषी, है वो विलासी, बुद्धि वैभव से कुंठित वो राही है। धर्म भुला कर्तव्या भुला , रहें और गणतव्य भुला। धारा मे...