राही

हां है वो भ्रमित वो राही है,
राहों का चयनित वो राही है।
दर्शन का अभिलाषी, है वो विलासी,
बुद्धि वैभव से कुंठित वो राही है।

धर्म भुला कर्तव्या भुला ,
रहें और गणतव्य भुला।
धारा में अविरल, दुनिया मे विकल
किंचित न विचलित वो राही है ।

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उद्देश्य मिश्रा

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