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Showing posts from October, 2017

जीने का हुनर

ज़िन्दगी  के  सिखाने  के  हुनर  और  बाकि  हैं मंज़िलो के  पार कुछ सफर  और   बाकि  हैं। ज़ख्म  तो  एक  नजरिया  है, बुज़दिलो  का,  हर शाम  के  बाद  कुछ  सहर  और  बाकि  हैं।

मुस्कुरा

कल  खोया  कल  पाएगा , होगा  तेरा  जो  है  होना। रोशन  जहा  फिर  हो  जायेगा , अँधेरे  में  काहे  विचलित  होना।  चल  उठ  देख  जरा  मन , बचे  अरमान  कुछ  और  भी  हैं। ये  सोच  मत  उन्हें  संजोयेगा  कैसे , तेरे  तरकश  में  कमान  और  भी  हैं । तू  नहीं  टुटा,  बस  सपने  टूटे,   सपनो  के  जहान और  भी  हैं।  कुटी  से  निकले  कदम  तो  देखो  दुनिया  में  मकान  और  भी  हैं । रोने  दे  उनको , चाहते  हैं  जो  वास्ते  उसके   इंसान  और  भी  हैं। क्यू  सिथिल  और  यु  शांत  है  तू ? तेरे  अम्बर  में  निशान  और  भी हैं। ----------------------------------- उद्देश्य मिश्रा 

तुम बस यूँ ही हसती जाना

कभी  जो  ख़ामोशी  हमारी,   मोहब्बत  हुआ  करती  थी,   अब  इस  कदर  समायी  मुझमे  की  बस  मज़बूरी  बनगयी  है । खुद  से  मिलने  की  खातिर,  दूर  रहते  थे  तुझसे,  अब  तो  खुद  से  ही  कुछ   दुरी  बढ़  गयी  है । तुम  कहते  हो कुछ  तो  बोलो,  हम  बोले  भी  तो  क्या ? समय  था  वो  कुछ  और,  जब  ख़यालात  आया  करते  थे । है  ये  समय  की  अभिपुष्टि,  या  किसी  की  कमी  सी  है , जो  अधरों  पर  शब्द  नहीं , आँखों  में नमी  सी  है अभी  राहें कुछ  ऊसर हैं,  न  ही  हैं  हम  अब  दीवाने,  राहे  फिर  जब  खिल  जाएँगी , निकालेंगे  वो  शेर  पुराने । ...

बेवक़्त पियो

कुछ  खुश  हो  कर  के  पीते हैं, कुछ  गम  ढ़ो कर  के  पीते  हैं,  वो  वक़्त  पाबंद क्या  पिए,  जो  वक़्त  वक़्त  पर  पीते  हैं।  ख़ुशी  गम  से  ऊपर  उन  लोगो  को  देखो,  जो  हर  वक़्त  जीते  हैं,  बेवक़्त  पीते  है।  --------------------------------------------- उद्देश्य मिश्रा 

क्या बदल गया

नयी  ज़िंदगी  में  आ  कर  जड़  हो  गया  हु,  बदनामियों  का  मै  अब  गढ़  हो  गया  हु । डरता  हु  जो  साया  मेरा  पड़ा  किसी  घर  तो  क्या  होगा , इसलिए  आवारा  घूमता  हु  बेघर  हो  गया  हु । नित्य  विषाद  में पिघल  कर  तरल  हो  रहा  हु, दिल  में  झांक  कर  देखा   तो  पत्थर  हो  गया  हु।  विडम्बना  है जीवन  की  जो  मुस्कुराता   हु  मै,  वरना  तो  रक्त  में  भी  जहर  हो  गया  हु । स्तंभित  रहना  एक  लक्ष्य  बन  गया  है,  चेतना  भी  जैसे  दगा   दे  गयी  हो । खलल  पवन  की  अविरल  धरा  में  है  ऐसी, कड  कड में  उसके  कलह  पड़ ...

नादान ही गुस्ताख़ है

जिस  सोच  में  एक  आग  थी , वह  सोच  ही  अब  राख  है,  बाग अब  वीरान  हुआ , बच  गयी  एक  साख  है। धूर्त  तब   इक  आँख  थी , जो  ढूढ़ती  ही  रात  थी  हर  पहर  अब  रात  है , उस  साख  पर  कई  आँख  हैं। शब्द  तो  अब  झूठ  हैं, सच  तो  बस  ये  बात  है,  कल  का  जो  नादान  था , वो   नादान  ही  गुस्ताख़  है । --------------------------------------------------------------- उद्देश्य मिश्रा 

हर पहर जल गया

गालियों में  हंगामा  था  हमने  तमाशा  देखा , तमाशे  में  जाने  कैसे  हमारा  घर  जल  गया । कलम  कश्मकश  में  थी  कुछ  लब्ज़  आये तो  हालात बदले, कश्मकश  बानी  रही  और  सारा शहर  जल  गया । सोचा  शाम  जली तो  क्या  कल  सुबह  फिर  आएगी , इसी  इंतजार  में  बैठे  थे  की  हर  पहर  जल  गया। --------------------------------- उद्देश्य मिश्रा