कभी जो ख़ामोशी हमारी, मोहब्बत हुआ करती थी, अब इस कदर समायी मुझमे की बस मज़बूरी बनगयी है । खुद से मिलने की खातिर, दूर रहते थे तुझसे, अब तो खुद से ही कुछ दुरी बढ़ गयी है । तुम कहते हो कुछ तो बोलो, हम बोले भी तो क्या ? समय था वो कुछ और, जब ख़यालात आया करते थे । है ये समय की अभिपुष्टि, या किसी की कमी सी है , जो अधरों पर शब्द नहीं , आँखों में नमी सी है अभी राहें कुछ ऊसर हैं, न ही हैं हम अब दीवाने, राहे फिर जब खिल जाएँगी , निकालेंगे वो शेर पुराने । ...