नादान ही गुस्ताख़ है

जिस  सोच  में  एक  आग  थी , वह  सोच  ही  अब  राख  है, 
बाग अब  वीरान  हुआ , बच  गयी  एक  साख  है।

धूर्त  तब   इक  आँख  थी , जो  ढूढ़ती  ही  रात  थी 
हर  पहर  अब  रात  है , उस  साख  पर  कई  आँख  हैं।

शब्द  तो  अब  झूठ  हैं, सच  तो  बस  ये  बात  है, 
कल  का  जो  नादान  था , वो   नादान  ही  गुस्ताख़  है ।
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उद्देश्य मिश्रा 

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