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Showing posts from July, 2019

यायावर

यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। जेष्ठ दोपहरी  भीग गए तो , सावन  में फिर जलना होगा। प्रकृति है जो रहे संतुलित, संतुलन में पलना होगा । पंख लगे तो उड़ जाता मैं, चक्र लगे तो दौड़ता रहता। प्रबल पाव तो कदम चलेंगे, या रेंग रेंग कर चलना होगा। यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। जड़ होना जो नियति होती, जड़ का जीवन मैं पाता। पुलकित होता अचल ही रहता, अचल भाव में झर जाता। भांति भांति की ऋतू जो आती, रंग देख कर इठलाता। जो ऋतू ना बदली सही समय पर, आश्रित होता, बस बिलखाता। चल जीवन है, चपल हो शैली, आरोहण हो या ढलना होगा। यायावरी मेरी विरासत है, यायावर मुुझको बनना होगा। --------------------------------- उद्देश्य मिश्र नियति- destiny, चल- moving, चपल- Agile, आरोहण- ascend

मन क्या ढूढ़ता है

कोई एक तलाश है, जो अब तक चल रही है, इसकी पुरानी प्यास है, जो अब तक जल रही है, डगर डगर घूमता, ये आसमाँ की छाँव में, मेरे अल्हड मन की जिद्द, अब तक अटल रही है। कम्बख्त क्षितिज पर कही सराय ढूढ़ता है, ज़िन्दगी को जीने का उपाय ढूंढता है। खुमार आवारगी का कुछ ऐसा चढ़ा इसपर, की हैसियत के पार की तम्मनाएँ ढूढ़ता है । ढूंढता है रोड़े, राहों में बिछाने को, मंजिल को खोने को, और खुद को मिटाने को, बांध कर पट्टी काली ,आँखों पर अपनी, जाना है जिधर वो दिशायें ढूढ़ता है। सुनता पत्तिओं को छेड़ती हवाओं को, सूंघता फैली मदमस्त फ़िज़ाओ को, लहराती नदियों में बाधाएं ढूढ़ता है बेशरम जाने क्या क्या बलायें ढूढ़ता है। किनारे पर बैठना इसे अच्छा नहीं लगता, भंवर में उतर कर लहर ढूढ़ता है, बन न पायेगा नीलकंठ, ये जानता है तभी भी जाने क्यों वो जहर ढूंढता है । निहारा है आसमां को, पूरी रात कल इसने, और आज दिन में वो एक तारा ढूढ़ता है, कुछ पल का खूबसूरत सफर था साथ उसके, फिर से उस सफर का सहारा ढूढ़ता है। खयालो में खोया रहता है  कहीं पर, लम्हे कुछ जीवन के छोड़ता वहीं पर, जगता है जब भी, जागती नींद से ये अपनी...

स्वयं

हुल्लड़ में, कटी पतंग सा हूँ, सतत धारा में, टूटी तरंग सा हूँ। अधूरा मैं, हैं अधूरी रचनाएं मेरी, संकलन में विचारो के, थोड़ा तंग सा हूँ। ----------------------------------------------- उद्देश्य मिश्रा