मन क्या ढूढ़ता है
कोई एक तलाश है, जो अब तक चल रही है,
इसकी पुरानी प्यास है, जो अब तक जल रही है,
डगर डगर घूमता, ये आसमाँ की छाँव में,
मेरे अल्हड मन की जिद्द, अब तक अटल रही है।
कम्बख्त क्षितिज पर कही सराय ढूढ़ता है,
ज़िन्दगी को जीने का उपाय ढूंढता है।
खुमार आवारगी का कुछ ऐसा चढ़ा इसपर,
की हैसियत के पार की तम्मनाएँ ढूढ़ता है ।
ढूंढता है रोड़े, राहों में बिछाने को,
मंजिल को खोने को, और खुद को मिटाने को,
बांध कर पट्टी काली ,आँखों पर अपनी,
जाना है जिधर वो दिशायें ढूढ़ता है।
सुनता पत्तिओं को छेड़ती हवाओं को,
सूंघता फैली मदमस्त फ़िज़ाओ को,
लहराती नदियों में बाधाएं ढूढ़ता है
बेशरम जाने क्या क्या बलायें ढूढ़ता है।
किनारे पर बैठना इसे अच्छा नहीं लगता,
भंवर में उतर कर लहर ढूढ़ता है,
बन न पायेगा नीलकंठ, ये जानता है
तभी भी जाने क्यों वो जहर ढूंढता है ।
निहारा है आसमां को, पूरी रात कल इसने,
और आज दिन में वो एक तारा ढूढ़ता है,
कुछ पल का खूबसूरत सफर था साथ उसके,
फिर से उस सफर का सहारा ढूढ़ता है।
खयालो में खोया रहता है कहीं पर,
लम्हे कुछ जीवन के छोड़ता वहीं पर,
जगता है जब भी, जागती नींद से ये अपनी,
छूटा हुआ वो लम्हा दुबारा ढूढ़ता है,
यहाँ वह ढूढ़ता है,कहाँ कहाँ ढूढ़ता है,
ढूढ़ता है और क्या ढूढ़ सकता है जीवन में,
बावला मन ये मेरा जाने क्या ढूढ़ता है।
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उद्देश्य मिश्र
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