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Showing posts from May, 2018

तुम

तुम  चंदा  सी  शीतल  हो  मुझमे  सूरज  की  गर्मी  है । तुम  अंदर  से  कोमल  हो, मुझमे  न  थोड़ी  भी  नरमी  है । तुम  फूल  हो  राजमहल  की रानियों  ने  खिलाया  है । मै  कांटा  हु  जंगल  का पाषाणों  से  लड़  कर  आया  हु । पवन  के  इन  झोंको  से ह्रदय  कांप  उठता  है  तेरा । मैने  जीवन  की  रहो  में तूफानों  को  झेला  है । डरा  नहीं  जो  अनंत  काल  से आज  फिर  क्यों  डरता  है । मार  सकता  है  जो  गज  को क्यों  तेरे  भय  से  मरता  है . कुछ  ऐसी  बात  तुझमे  है  विदुषी जो  तुझको  मालूम  नहीं । उस  सूरज  सा  तेज  है  तेरा जो  उगता  क्षितिज पर  दूर  कही । ...

अतीत

आज  खोला  अतीत  के  पन्नो  को रेत की  चादर  पर  एक  बस्ती  थी  मेरी , समंदर  के  नीलम  में  तैरती  वो  कश्ती  थी  मेरी , लहरों  में  खेलती  वो  मस्ती  थी  मेरी | तूफानों  ने  घेरा  उस  सागर  में  कश्ती  को , वरना  साहिल  पर  तो  कुछ  हस्ती  थी  मेरी| ----------------- उद्देश्य मिश्रा