तुम
तुम चंदा सी शीतल हो मुझमे सूरज की गर्मी है । तुम अंदर से कोमल हो, मुझमे न थोड़ी भी नरमी है । तुम फूल हो राजमहल की रानियों ने खिलाया है । मै कांटा हु जंगल का पाषाणों से लड़ कर आया हु । पवन के इन झोंको से ह्रदय कांप उठता है तेरा । मैने जीवन की रहो में तूफानों को झेला है । डरा नहीं जो अनंत काल से आज फिर क्यों डरता है । मार सकता है जो गज को क्यों तेरे भय से मरता है . कुछ ऐसी बात तुझमे है विदुषी जो तुझको मालूम नहीं । उस सूरज सा तेज है तेरा जो उगता क्षितिज पर दूर कही । ...