तुम
तुम चंदा सी शीतल हो
मुझमे सूरज की गर्मी है ।
तुम अंदर से कोमल हो,
मुझमे न थोड़ी भी नरमी है ।
तुम फूल हो राजमहल की
रानियों ने खिलाया है ।
मै कांटा हु जंगल का
पाषाणों से लड़ कर आया हु ।
पवन के इन झोंको से
ह्रदय कांप उठता है तेरा ।
मैने जीवन की रहो में
तूफानों को झेला है ।
डरा नहीं जो अनंत काल से
आज फिर क्यों डरता है ।
मार सकता है जो गज को
क्यों तेरे भय से मरता है .
कुछ ऐसी बात तुझमे है विदुषी
जो तुझको मालूम नहीं ।
उस सूरज सा तेज है तेरा
जो उगता क्षितिज पर दूर कही ।
चाहत पाली थी दिल में
तुझे अपने रंग में रंग लूंगा।
तू तो खुद ही आफताब है
मै तुझे क्या आफताब दूंगा ।
------------
उद्देश्य मिश्रा
मुझमे सूरज की गर्मी है ।
तुम अंदर से कोमल हो,
मुझमे न थोड़ी भी नरमी है ।
तुम फूल हो राजमहल की
रानियों ने खिलाया है ।
मै कांटा हु जंगल का
पाषाणों से लड़ कर आया हु ।
पवन के इन झोंको से
ह्रदय कांप उठता है तेरा ।
मैने जीवन की रहो में
तूफानों को झेला है ।
डरा नहीं जो अनंत काल से
आज फिर क्यों डरता है ।
मार सकता है जो गज को
क्यों तेरे भय से मरता है .
कुछ ऐसी बात तुझमे है विदुषी
जो तुझको मालूम नहीं ।
उस सूरज सा तेज है तेरा
जो उगता क्षितिज पर दूर कही ।
चाहत पाली थी दिल में
तुझे अपने रंग में रंग लूंगा।
तू तो खुद ही आफताब है
मै तुझे क्या आफताब दूंगा ।
------------
उद्देश्य मिश्रा
Comments
Post a Comment