Posts

Showing posts from September, 2017

ज्ञानी लोग

उसूल जो बना रहा तू अपने जीने के, कल का बेहूदा है तू, ये शर्त लगा ले। पोथियाँ पढ़, कुछ तमीज सीख, अपने अरमानो पर एक सुखी परत लगा ले। जो जाता है उनकी गलियों में कभी भी, आँखें बंद रखना , भरोसा उठ जाता है। जूठन जो मिले ज्ञान का कही , खा लेना हर ज्ञानी वहा वही खाता है। आज़ाद परिंदो का जाना मना है उधर, वो कहते है आवारा कुछ न सीख पाता है। मचलता है इधर ,उधर मड़राता है, आवारापन ज्ञान को उनके खा जाता है। वो आवारा था, अब बेहूदा है, लड़े क्यों, बदनामी कबूल कर ली। नजरो में उनकी गिरा है, पर हर्षित है, जिसने ये छोटी सी भूल कर ली। ----------------- उद्देश्य मिश्रा हर्षित- Joyful

मैं कौन हूँ

मैं धर्म हूँ अधर्म हूँ पाखंडी और विनम्र हूँ मैं अगुण हूँ मैं सगुण हूँ या फिर मैं निर्गुण हूँ। मैं दृश्य हूँ अदृश्य हूँ मैं भूत और भविष्य हूँ, मैं आदि हूँ मैं अंत हूँ या फिर अनंत हूँ। मैं मंत्र हूँ विलाप हूँ वरदान हूँ और श्राप हूँ, जो चाहो वो तुम मान लो मैं कलह हूँ और जाप हूँ । -------------------------------- उद्देश्य मिश्रा

हिंदुस्तान

अज्ञानिओ के अहंकार देखे हैं संतो के घर हथियार देखे हैं , चिल्लाते गूंगो की कौम देखी है नंगे घूमते जागीरदार देखे हैं । सच कहते हैं लोग हिंदुस्तान देश नहीं कल्पना है , हमने यहाँ तिलमिलाती जनता और गूंगी सरकार देखे है । ------------------------------------ उद्देश्य मिश्रा

कुछ खोया

घने पीपल के पेड़ से छन कर आती, शाम की धुंधली रोशनी ! दिल के अँधेरे को मिटा नहीं पायी हल्की हवा भी उस धुए को हटा नहीं पायी । रात चढ़ती गयी, अँधेरा बढ़ता गया , तभी कही एक चिराग जगमगाया , अँधेरे को चीरता हुआ, टिमटिमाता हुआ , रात और चढ़ी और वो खो गया, वक़्त की आगोश में । रात ढली अँधेरा और बढ़ गया , सूरज दिखाई दिया दूर कही , सोने की अंगूठी की तरह, पर बेबस लाचार। कही नीलम में तैरता हुआ, जैसे रौशनी देना भूल कर विहार कर रहा हो । कही कुछ टुटा था, बिखरा था , पर कहा , क्या , और कब कुछ पता नहीं । मेरा दिल तो वही है , अभी भी पीपल के निचे , पीछे देखा तो महफ़िल नहीं थी दोस्तों की, वो बातें गुम हुई थी जो बेमतलब होती थी , वो लम्हे गुम हुए थे जो बेमतलब खोते थे । ----------------------------------------------------------- उद्देश्य मिश्रा

सफर

ये कारवां ये उठता गुबार, अनंत तक जाती राहे बदलती मंजिलें बार बार | आगाज़ में कुछ लोग चले थे, कुछ हमें तो कुछ दुनिया छोड़ गए | राहों में कुछ नए जुड़े , और राहों में ही मुड़ गए | कभी हौसले पस्त हुए कभी खुद को फतह किआ, कभी गैर हमराज़ हो गए तो कभी खुद को ही खो दिया | रश्मि का वो सुबह को आना, शाम को अँधेरे का उपहास, किसी अनदेखे हमराही का वो हर पल होना अहसास, वो चाँद तारो का इनपर यु करना अट्टहास| पगडंडिया तब्दील हुई सड़को में, बल्ब बानी ढिबरी की चाहे, पर हमारी तिकड़ी कभी न बदली, मै मेरे गीत और मेरी राहे | जीवन मेरा कुछ ऐसा ही खूबसूरत सफर रहा है । ------------------------------------------ उद्देश्य मिश्रा