कुछ खोया
घने पीपल के पेड़ से छन कर आती,
शाम की धुंधली रोशनी !
दिल के अँधेरे को मिटा नहीं पायी
हल्की हवा भी उस धुए को हटा नहीं पायी ।
शाम की धुंधली रोशनी !
दिल के अँधेरे को मिटा नहीं पायी
हल्की हवा भी उस धुए को हटा नहीं पायी ।
रात चढ़ती गयी, अँधेरा बढ़ता गया ,
तभी कही एक चिराग जगमगाया ,
अँधेरे को चीरता हुआ, टिमटिमाता हुआ ,
रात और चढ़ी और वो खो गया,
वक़्त की आगोश में ।
तभी कही एक चिराग जगमगाया ,
अँधेरे को चीरता हुआ, टिमटिमाता हुआ ,
रात और चढ़ी और वो खो गया,
वक़्त की आगोश में ।
रात ढली अँधेरा और बढ़ गया ,
सूरज दिखाई दिया दूर कही ,
सोने की अंगूठी की तरह, पर बेबस लाचार।
कही नीलम में तैरता हुआ,
जैसे रौशनी देना भूल कर विहार कर रहा हो ।
सूरज दिखाई दिया दूर कही ,
सोने की अंगूठी की तरह, पर बेबस लाचार।
कही नीलम में तैरता हुआ,
जैसे रौशनी देना भूल कर विहार कर रहा हो ।
कही कुछ टुटा था, बिखरा था ,
पर कहा , क्या , और कब कुछ पता नहीं ।
पर कहा , क्या , और कब कुछ पता नहीं ।
मेरा दिल तो वही है , अभी भी पीपल के निचे ,
पीछे देखा तो महफ़िल नहीं थी दोस्तों की,
वो बातें गुम हुई थी जो बेमतलब होती थी ,
वो लम्हे गुम हुए थे जो बेमतलब खोते थे ।
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उद्देश्य मिश्रा
पीछे देखा तो महफ़िल नहीं थी दोस्तों की,
वो बातें गुम हुई थी जो बेमतलब होती थी ,
वो लम्हे गुम हुए थे जो बेमतलब खोते थे ।
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उद्देश्य मिश्रा
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