तुम बस यूँ ही हसती जाना

कभी  जो  ख़ामोशी  हमारी,  
मोहब्बत  हुआ  करती  थी,  
अब  इस  कदर  समायी  मुझमे 
की  बस  मज़बूरी  बनगयी  है ।

खुद  से  मिलने  की  खातिर, 
दूर  रहते  थे  तुझसे, 
अब  तो  खुद  से  ही  कुछ  
दुरी  बढ़  गयी  है ।

तुम  कहते  हो कुछ  तो  बोलो, 
हम  बोले  भी  तो  क्या ?
समय  था  वो  कुछ  और, 
जब  ख़यालात  आया  करते  थे ।

है  ये  समय  की  अभिपुष्टि, 
या  किसी  की  कमी  सी  है ,
जो  अधरों  पर  शब्द  नहीं ,
आँखों  में नमी  सी  है

अभी  राहें कुछ  ऊसर हैं, 
न  ही  हैं  हम  अब  दीवाने, 
राहे  फिर  जब  खिल  जाएँगी ,
निकालेंगे  वो  शेर  पुराने ।

कहीं  पूरब  में  दूर  पवन पर ,
हम  बैठेंगे  शायर  बन  कर ,
फिर  न  ये  वक़्त  याद दिलाना  
तुम  बस  यूँ ही  हसती  जाना .....
तुम  बस  यूँ  ही  हसती  जाना..... 
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उद्देश्य मिश्रा  

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