तुम सर्जक बनो
तुम सर्जक बनो, लगो स्वप्न सृजन में।
वो चरित्रहीन हैं,जो स्वप्न मारते।
हर सहर सम्पूर्ण होते, मुस्कुराते,
काम पर चले जाते, परंतु
शाम की मद्धम रोशनी में, खंडित हो घर आते।
आराम फरमाते, विफलता छुपाते,
योजनाए बनाते, दंभ जताते,
कैसे भी बस , दिल बहलाते।
वो चरित्रहीन हैं,जो स्वप्न मारते।
जो तुम सर्जक बनो, लगो स्वप्न सृजन में।
उषा से आच्छादित हो तिमिर भागे,
सूर्यकिरण तब सौम्य स्वर्णिम जागे,
सौम्य स्वर्णिम ही जिये, और छुपने को,
सौम्य संध्या से स्वर्णिम आंचल मांगे।
ना दहन हो और भी स्वप्नों का,
विवशता में वा निर्बलता में,
ना शिथिल हों ना समाहित हो जाएं
कृत्रिम यथार्थ की छाया में, मिथ्या की माया में।
तुम सर्जक बनो , लगो स्वप्न सृजन में।
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उद्देश्य मिश्रा
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