प्रेम के कुछ गीत
मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ ।
घर के शीश पर जा कर के कुछ बैठ जाते,
धूप और बारिश से क्रीड़ा हैं रचाते ।
कुछ की किस्मत फर्श में है लिखी जाती,
नित्य पोछि उनकी जाती है वो छाती ।
कुछ पा कर है रूप मूर्ति, आराध्य बनते ,
साधु संत और सूफियो का साध्य बनते।
धूप और बारिश से क्रीड़ा हैं रचाते ।
कुछ की किस्मत फर्श में है लिखी जाती,
नित्य पोछि उनकी जाती है वो छाती ।
कुछ पा कर है रूप मूर्ति, आराध्य बनते ,
साधु संत और सूफियो का साध्य बनते।
पर हर कदम की ठोकरे लगती है जिसको
उस पाषाण के टिका लगाना चाहता हूँ,
मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ |
उस पाषाण के टिका लगाना चाहता हूँ,
मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ |
बाग की तरुणाई में कुछ झुमती है,
भृंग के अधरों को यू ही चूमती है,
कुछ का जीवन है न्योछावर श्रृंगार में तो
कुछ का जीवन इत्र और गुलाल में तो
कुछ का जीवन यू ही डंठल पर है सुखा
या न्योछावर जानवर पर जो है भूखा।
भृंग के अधरों को यू ही चूमती है,
कुछ का जीवन है न्योछावर श्रृंगार में तो
कुछ का जीवन इत्र और गुलाल में तो
कुछ का जीवन यू ही डंठल पर है सुखा
या न्योछावर जानवर पर जो है भूखा।
कुछ है कलिया वायु की धारा में उड़ गई,
उनसे ही संगीत उठाना चाहता हूँ
मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ।
उनसे ही संगीत उठाना चाहता हूँ
मैं प्रेम के कुछ गीत गाना चाहता हूँ।
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उद्देश्य मिश्रा
आपके कवित्व पर कभी संदेह नही रह ,किन्तु प्रकृति में प्रकृति की चोट को दुख को हरने और उसके हर प्रखंड के लोए प्रेमगीत लिखने की ये अभिलाषा अनुपम है ।
ReplyDeleteआशा रहेगी कि आप इस गीत को माह काव्य में परिणित करेंगे।
धन्यवाद , अभी तक महाकाव्य लिखने सामर्थ्य नही है परंतु कोशिश जरूर रहेगी|
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